
कुरुक्षेत्र, 6 जुलाई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज (आईपीएस) द्वारा विश्व जूनोसिस दिवस के अवसर पर ष्वन वर्ल्ड, वन हेल्थष् विषय पर विशेष संगोष्ठी एवं जन-जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाले संक्रमणों (जूनोटिक रोगों) के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनकी रोकथाम में फार्मासिस्टों एवं औषधि अनुसंधान की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करना था।
संस्थान की निदेशक प्रो. नीरा राघव ने बताया कि विश्व जूनोसिस दिवस 6 जुलाई 1885 को वैज्ञानिक लुई पाश्चर द्वारा प्रथम रेबीज़ वैक्सीन के सफल परीक्षण की स्मृति में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि पशुओं के समय पर टीकाकरण और एक्सपोजर के बाद दी जाने वाली प्रोफिलैक्सिस के माध्यम से रेबीज़ की रोकथाम संभव है, लेकिन जन-जागरूकता ही इस घातक बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है, क्योंकि लक्षण प्रकट होने के बाद इसकी मृत्यु-दर लगभग 100 प्रतिशत होती है।
कार्यक्रम का आयोजन प्रो. जितेन्द्र शर्मा, डीन, इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज तथा निदेशक प्रो. नीरा राघव के मार्गदर्शन में किया गया। इस अवसर पर डॉ. सुखबीर लाल खोखरा ने रेबीज़, लेप्टोस्पायरोसिस और स्क्रब टाइफस जैसे जूनोटिक रोगों की रोकथाम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन बीमारियों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए मानव चिकित्सा, पशु चिकित्सा और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
डॉ. मंजूषा ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के वर्तमान परिदृश्य, टीकाकरण से जुड़ी चुनौतियों तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित वैक्सीन विकास और वैक्सीन फॉर्म्युलेशन में हो रही नवीनतम प्रगति की जानकारी दी। वहीं डॉ. सुरेन्द्र वर्मा ने जूनोटिक रोगों के कारणों, विभिन्न प्रकार के रोगजनकों, पशु स्वास्थ्य के मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव, इनके लक्षणों तथा आवश्यक सावधानियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में एम. फार्मेसी के विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वक्ताओं ने विशेष रूप से मानसून के मौसम में बढ़ने वाले जूनोटिक रोगों के खतरे के प्रति सतर्क रहने और समय रहते बचाव के उपाय अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के समापन पर निदेशक प्रो. नीरा राघव ने सफल आयोजन के लिए पूरे संस्थान परिवार को बधाई दी। उन्होंने जनस्वास्थ्य जागरूकता फैलाने में फार्मासिस्टों की महत्वपूर्ण भूमिका, पशुओं के जिम्मेदार टीकाकरण, स्वच्छ पशुपालन तथा पशुओं में एंटीबायोटिक दवाओं के अनियंत्रित उपयोग से उत्पन्न एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी वैश्विक चुनौती पर विशेष बल दिया।






