डालर के मुकाबले 96.53 पर आया रुपया, जानिए गिरावट के प्रमुख कारण

मुंबई
रुपया मंगलवार को डालर के मुकाबले 24 पैसे गिरकर पहली बार 96.53 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। इससे पहले सोमवार को रुपया 96.29 के स्तर पर बंद हुआ था। पिछले कुछ दिनों से रुपए में लगातार गिरावट जारी है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर, 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। इससे महंगाई बढऩे का खतरा बढ़ गया है। मार्केट एक्सपट्र्स का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और जियोपॉलिटिकल तनाव कम नहीं हुआ, तो रुपया जल्द ही 100 के स्तर को भी छू सकता है। मिडिल ईस्ट संघर्ष को दशकों का सबसे गंभीर एनर्जी संकट माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है।
कच्चे तेल महंगे होने से भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ा है। डालर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल और इम्पोर्टेड सामान महंगे होंगे, जिससे रिटेल महंगाई बढ़ सकती है। विदेश जाने या पढ़ाई के लिए डालर खरीदने पर अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। मोबाइल, लैपटॉप और आयातित पाट्र्स महंगे हो सकते हैं, क्योंकि भुगतान डॉलर में होता है। ईरान संकट और कच्चे तेल की भडक़ती आग के बीच दुनियाभर के बॉन्ड मार्केट में तेजी है। अमरीका में बेंचमार्क 10 साल के बॉन्ड की यील्ड 4.63 फीसदी पर पहुंच गई है, जो पिछले 16 महीने का सबसे ऊपरी स्तर है। यूरोजोन के बॉन्ड की यील्ड पहले से ही 15 साल के रिकार्ड स्तर पर बनी हुई है। यूके (गिल्ट्स) और जापान के बॉन्ड में भी भारी उछाल है।
गिरावट के प्रमुख कारण
अमरीका-इरान युद्ध और पश्चिम एशिया संकट— मिडिल ईस्ट में अमरीका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है। भू-राजनीतिक अनिश्चितता के चलते ग्लोबल मार्केट में डर का माहौल है, जिससे निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत) से पैसा निकाल रहे हैं।
क्रूड ऑयल की कीमत— अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें उछलकर 110 डालर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ गया है और डॉलर की मांग तेजी से बढ़ी है।
होर्मुज रूट की नाकेबंदी— खाड़ी देशों से तेल सप्लाई के सबसे महत्त्वपूर्ण रास्ते होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी और रुकावटों की वजह से तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली—वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता को देखते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपने पैसे निकाले हैं। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर डालर में बदलते हैं, तो रुपए पर दबाव बढ़ता है।
मजबूत डालर और अमरीकी बॉन्ड यील्ड में तेजी— सुरक्षित निवेश के रूप में दुनिया भर में अमरीकी डालर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है, जिससे डालर इंडेक्स मजबूत हुआ है। इसके साथ ही अमरीकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण निवेशकों के लिए डालर में निवेश करना ज्यादा फायदेमंद हो गया है।
ऐसे तय होती है करंसी की कीमत
डालर के मुकाबले किसी करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना या कमजोरी (करेंसी डेप्रिसिएशन) कहते हैं। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे इंटरनेशनल ट्रांजेक्शन होते हैं। इसके घटने-बढऩे का असर करेंसी पर पड़ता है। अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डालर पर्याप्त होंगे, तो
रुपया स्थिर रहेगा। डालर घटे तो रुपया कमजोर, बढ़े तो मजबूत होगा।





