महिला सुरक्षा के दावों की जमीनी हकीकत: Odisha की छात्रा को आत्मदाह की कगार पर क्यों जाना पड़ा?
बालासोर, ओडिशा | 12 जुलाई 2025: सरकारें हों या अदालतें, सभी मंचों पर महिलाओं की सुरक्षा, गरिमा और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात की जाती है। नीतियाँ बनती हैं, समितियाँ गठित होती हैं, संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया जाता है, लेकिन जब बात ज़मीन पर बदलाव की होती है, तो तस्वीर अक्सर बेहद दर्दनाक और निराशाजनक होती है।
ओडिशा (Odisha)के फकीर मोहन ऑटोनॉमस कॉलेज की एक छात्रा की हालिया घटना यही सोचने पर मजबूर करती है —
क्या अपनी बात सुनवाने के लिए एक छात्रा को आत्मदाह जैसा कठोर कदम उठाना ज़रूरी हो गया था?
मानसिक उत्पीड़न के आरोप, लेकिन कोई सुनवाई नहीं
इंटीग्रेटेड बीएड द्वितीय वर्ष की छात्रा ने कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक पर मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया था। छात्रा का कहना था कि उन्होंने एक अनुचित प्रस्ताव को ठुकराया, जिसके बाद उन्हें लगातार मानसिक रूप से परेशान किया जाने लगा।
उसने कॉलेज प्रशासन और आंतरिक शिकायत समिति को कई बार लिखित में शिकायत दी, लेकिन किसी भी स्तर पर उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।
एक सप्ताह तक शांतिपूर्ण धरना, फिर हताशा
जब शिकायतों पर कोई असर नहीं हुआ, तो छात्रा ने कॉलेज परिसर में शांतिपूर्ण धरना शुरू किया।
उसने प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी भी दी थी कि अगर 7 दिनों के भीतर कार्रवाई नहीं हुई, तो वह कठोर कदम उठाएगी। लेकिन अफ़सोस, कोई ठोस जवाब नहीं आया।
आत्मदाह की कोशिश, अस्पताल में ज़िंदगी से जंग
शनिवार को, कॉलेज प्राचार्य कार्यालय के सामने छात्रा ने खुद पर पेट्रोल डालकर आत्मदाह का प्रयास किया।
वह 90% से अधिक जल गई और उसे गंभीर हालत में कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।
उसे बचाने की कोशिश में एक अन्य छात्र भी झुलस गया, जो फिलहाल उपचाराधीन है।
देरी से जागी पुलिस और प्रशासन
घटना के बाद छात्रों में जबरदस्त आक्रोश फैल गया। उन्होंने आरोपी शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। अब जाकर पुलिस ने शिक्षक को हिरासत में लिया है, लेकिन सवाल यह है:
जब शिकायत पहले से दर्ज थी, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कॉलेज प्रशासन और शिकायत समिति की जवाबदेही कौन तय करेगा?






