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‘चंडी मंदिर’ से मिला चंडीगढ़ को नाम, अर्जुन को यहीं मिला था महाभारत विजय का वरदान

चंडीगढ़, 25 सितंबर 2025 – चंडीगढ़ का नाम आज देश-विदेश में प्रसिद्ध है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस शहर का नाम ‘चंडी मंदिर’ के नाम पर पड़ा है। शिवालिक की पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसका इतिहास 5000 वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है।

पौराणिक कथा: अर्जुन को मिला था तेजस्वी तलवार का वरदान

किवदंती के अनुसार, जब पांडव 12 वर्षों के वनवास पर थे, तब वे इस स्थान पर रुके थे। अर्जुन ने चंडी माता की तपस्या की और मां को प्रसन्न कर युद्ध में विजय और एक दिव्य तलवार का वरदान प्राप्त किया। कहा जाता है कि यही वरदान उन्हें महाभारत युद्ध में विजयी बनाने का आधार बना।

मां चंडी का प्राचीन मंदिर – 62 पीढ़ियों से चली आ रही सेवा

मंदिर के मुख्य पुजारी और वर्तमान महंत बाबा राजेश्वरी जी के अनुसार, यह मंदिर आज भी उसी श्रद्धा और परंपरा के साथ संचालित हो रहा है। मां चंडी की सेवा अब पूर्वज साधु महात्माओं की 62वीं पीढ़ी कर रही है। मंदिर की स्थापना एक तपस्वी साधु ने की थी, जिन्हें तपस्या के दौरान मां दुर्गा की मूर्ति प्राप्त हुई थी। उन्होंने घास, मिट्टी और पत्थर से एक छोटा मंदिर बनाकर इसे ‘चंडी मंदिर’ नाम दिया। मां के दरबार में भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, जिससे यह स्थान दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।

5000 साल पुराना चंडी मंदिर

देश के पहले राष्ट्रपति से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला

1953 में, जब भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद चंडी मंदिर में दर्शन के लिए आए, तो वह इसकी शक्ति और पौराणिक महत्ता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने घोषणा की “इस स्थान के नाम पर ही इस नए शहर का नाम ‘चंडीगढ़’ रखा जाएगा।” यही कारण है कि आज चंडीगढ़ शहर को यह नाम चंडी माता के मंदिर से मिला।

नवरात्रि पर विशेष सजावट और श्रद्धालुओं की भीड़

22 सितंबर से नवरात्रि शुरू हो चुकी हैं और चंडी मंदिर को फूलों, रोशनी और धार्मिक झांकियों से भव्य रूप में सजाया गया है। इन पावन दिनों में यहां हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और पूजा अर्चना कर मनोकामनाएं मांगते हैं।

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