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आर्थिक बोझ का हवाला देकर मुआवजे का अधिकार नहीं छीन सकते

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि सिर्फ वित्तीय बोझ बढऩे का हवाला देकर भूमि अधिग्रहण में उचित क्षतिपूर्ति के संवैधानिक अधिकार को कम नहीं किया जा सकता है। सिर्फ आर्थिक बोझ के आधार पर उचित मुआवजा नहीं छीना जा सकता है। पीठ ने एनएचएआई की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने 2019 के फैसले को केवल भविष्य में लागू करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा और ब्याज का भुगतान वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकता। उचित मुआवजे की संवैधानिक गारंटी को इस आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। केवल संभावित वित्तीय देनदारी दिखाना समीक्षा का वैध आधार नहीं है। एनएचएआई ने अदालत से कहा था कि अगर 2019 के फैसले को पुराने मामलों पर भी लागू किया गया, तो सरकार पर करीब 29,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा, इसलिए इसे केवल भविष्य के मामलों पर लागू किया जाए।

हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले से अंतिम रूप ले चुके मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। अदालत ने तीन अहम स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि जिन भूमि मालिकों के क्षतिपूर्ति के दावे 28 मार्च, 2015 (जब नया भूमि अधिग्रहण कानून प्रभावी हुआ) तक लंबित थे, उन्हें मुआवजा और नौ फीसदी ब्याज का लाभ मिलेगा। जहां मुआवजा बढ़ा, लेकिन क्षतिपूर्ति का मुद्दा तय नहीं हुआ, ऐसे मामलों में भूमि मालिक कानून के अनुसार क्षतिपूर्ति और ब्याज की मांग कर सकते हैं। हालांकि ब्याज केवल उस तारीख से मिलेगा, जब दावा उठाया गया। जिन मामलों में 28 मार्च, 2015 से पहले मुआवजा अंतिम रूप ले चुका था और कोई कार्यवाही लंबित नहीं थी, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। 2019 में एक मामले में अदालत ने कहा था कि जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के लिए ली गई है, जमीन मालिकों को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत क्षतिपूर्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

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