अर्थव्यवस्था पर गहराया संकट

अमरीकी रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष (एफवाई27) के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 6.7 फीसदी से घटाकर 6.4 फीसदी कर दिया है। फिच का कहना है कि अमरीका-ईरान जंग की वजह से सितंबर और दिसंबर तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी होगी। फिच रेटिंग्स ने अपनी जून ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में कहा है कि अमरीका-ईरान जंग की वजह से पैदा हुए तेल संकट का असर वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखेगा। रेटिंग एजेंसी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी (सितंबर) और तीसरी (दिसंबर) तिमाही में आर्थिक सुस्ती सबसे ज्यादा नजर आएगी। जंग के कारण बढ़ती कीमतें लोगों की रियल इनकम को प्रभावित कर रही हैं।
इससे कंज्यूमर स्पेंडिंग यानी आम उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले खर्च में कमी आएगी। हालांकि, देश के भीतर कैपिटल एक्सपेंडिचर में मजबूती बनी हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पिछले 14 हफ्तों से बंद है। फिच ने अनुमान जताया है कि यह जुलाई से पहले नहीं खुलेगा। इसी तेल संकट के चलते फिच ने साल 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड ऑयल की औसत कीमत का अनुमान 70 डालर प्रति बैरल से बढ़ाकर $87 प्रति बैरल कर दिया है। हाल के हफ्तों में ही ईंधन की कीमतें 4-5 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं। महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए फिच का मानना है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी नीति में बदलाव कर सकता है। हालांकि अप्रैल की बैठक में आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर स्थिर रखा था।
घरेलू मांग रहेगी ग्रोथ का जरिया
फिच ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी ग्रोथ घटकर 6.4 फीसदी रह जाएगी, जो हमारे मार्च के अनुमान से 0.3 फीसदी कम है। हालांकि, घरेलू मांग ही इस ग्रोथ की मुख्य ड्राइवर बनी रहेगी। इसके साथ ही वास्तविक रूप से कम आयात होने के कारण नेट एक्सटर्नल डिमांड का ग्रोथ में पॉजिटिव योगदान रहेगा।
साल के अंत तक 5.3 फीसदी पर पहुंच सकती है महंगाई
भारत में अभी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित रिटेल महंगाई 3.5 फीसदी और थोक महंगाई अप्रैल में सालाना आधार पर 8.3 फीसदी रही है। हालांकि रिटेल महंगाई अभी बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है, लेकिन दबाव लगातार बढ़ रहा है। फिच का अनुमान है कि बेस इफेक्ट और महंगी एनर्जी की वजह से इस कैलेंडर वर्ष के अंत तक महंगाई दर बढक़र 5.3 फीसदी तक पहुंच सकती है। इसके अलावा देश के कुछ हिस्सों में जारी हीटवेव और औसत से कम मानसून के अनुमान ने भी महंगाई का जोखिम बढ़ा दिया है।






