आरोपी को चार्जशीट न देना बेल का आधार नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मुंबई उच्च न्यायालय का आदेश सही ठहराया

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 187(3) की व्याख्या करते हुए महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी समय-सीमा के भीतर न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर देती है, तो केवल आरोपी को चार्जशीट की प्रति उपलब्ध न कराए जाने के आधार पर उसे डिफॉल्ट जमानत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि डिफॉल्ट जमानत का अधिकार तभी उत्पन्न होता है, जब जांच एजेंसी निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में विफल रहती है। चार्जशीट की प्रति उपलब्ध कराने का प्रश्न अलग प्रक्रिया से जुड़ा है और इसे डिफॉल्ट जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। जज संजय करोल और जज नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला सीबीआई द्वारा दर्ज एक साइबर धोखाधड़ी मामले में सुनाया।
अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें आरोपी की डिफॉल्ट जमानत की याचिका खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा बीएनएसएस की धारा 187(3) की की गई व्याख्या पूरी तरह सही है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। मामला लगभग 3.81 करोड़ रुपए की कथित साइबर ठगी से जुड़ा है। जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार किया गया और निर्धारित समय सीमा के भीतर सीबीआई ने सक्षम न्यायालय में चार्जशीट प्रस्तुत कर दी। हालांकि आरोपी ने यह तर्क देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में डिफॉल्ट जमानत की मांग की कि उसे चार्जशीट की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई है। आरोपी का कहना था कि बीएनएसएस की धारा 187(3) के तहत यह भी डिफॉल्ट जमानत का आधार माना जाना चाहिए। उसके अनुसार केवल चार्जशीट दाखिल कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी प्रति आरोपी को समय पर उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 187(3) का उद्देश्य जांच एजेंसी को निर्धारित समय के भीतर जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने के लिए बाध्य करना है।






